सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

हर एक शख्स में तेरा चेहरा देखा है !

 



हर एक शख्स में तेरा चेहरा देखा है !

मैंने चेहरों में तुझको बदलते देखा है !!


यूं जानने का शौक तो दुनियां को हमें न था कभी कोई!

तेरे जाने के बाद जहां भर को अपने अन्दर आते देखा है !!


सुना था बुजुर्गों से मौसम ही बदलता है हर मौसम में पर !

तमीजदारों की तमीजों को भी जहालत में बदलते देखा है!


मुसीबतों में भी जो साथ छोड़ ना पाते थे कभी !

हमने उन दोस्तों को भी दर वक्त बदलते देखा है !


सोचता हूं अब राब्ता ही ना रखूं इस दुनिया से कोई !

पर क्या करूं हर सुबह अपनी सोच बदलते देखा है !!


हर इक शख्स में तेरा चेहरा देखा है !

मैंने चेहरों में तुझको बदलते देखा है !!


- रूपेश


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

मैं इश्क हूं जाया नहीं जाऊंगा !!!

  मैं इश्क हूं जाया नहीं जाऊंगा ! कयामत तलक तुझे याद आऊंगा !! जब भी बीतेंगी गुरबतों में जिन्दगी ! फिर से मोहब्बत का पैगाम फहरा जाऊंगा !! जब बंटेगी जिन्दगानियां फिरकापरस्ती में ! मैं मुल्क की मजहबी दीवारें गिराने आऊंगा !! पुकारेगा लहू जब भी पुरजोर मेहनतकशों का मैं अपना लाल रंग उस लहू में मिला जाऊंगा !! जो चाहेगा बने रहे मुल्क, सबके रहने लायक मैं हर उस शख्स को बावक्त याद आऊंगा !! मैं इश्क हूं , जाया नहीं जाऊंगा  कयामत तलक, तुझे याद आऊंगा !! - रूपेश ( भगतसिंह के लिये...उनके जन्मदिन पर... 28 सितम्बर )

हमारे जीवन में romanticism

आज बहुत दिनों के बाद कुछ लिखने का मन हुआ ..................जीवन सामान्यतः जैसा दीखता है वैसा वस्तुतः होता नहीं .........ये विडम्बना ही तो है कि कैशोर्य में जिस जीवन में जीने की हम कल्पना करते हैं युवा होते- होते उसी कल्पना का उपहास करने लग जाते हैं ..........उसे कोरी भावुकता कह कर नज़रंदाज़ करने की कोशिश करते हैं.............बदती आयु कहीं न कहीं हमें उस romanticism से दूर कर देती है जो कि जीवन को देखने का एक निर्दोष नजरिया देती है ............समय क़ी प्रगति कहीं न कहीं हमें यह एहसास कराने लग जाती है कि जीवन विशुध्तः व्यवहार पर ही चलता है भावुकता पे नहीं ......क्या इसे हमें अपनी हार नहीं मानना चाहिए ! कि जिन भावनाओं को लेकर हमने अपने जीवन का आरम्भ किया था आज उन्ही का हमारे जीवन में नामों निशान तक नहीं है...............अगर यही romanticism भगत सिंह के जीवन से निकल जाता तो क्या वह अपनी जान हमारे लिए देते ? या नरेन्द्र को हम विवेकानंद के रूप में जान पाते ? कहीं न कहीं ये उनका जीवन के प्रति romanticism ही था कि उन्होंने वह किया जो कि उनको संतुष्ट करता था ...........अगर आज हम अपने जीवन...

विचार .....

आज पुनः सोच रहा यह ह्रदय मेरा ..........आखिर कब आएगा वह सवेरा ? है जिसमे राम - राज्य की परिकल्पना .....सर्वत्र सबके लिए सद्भावना , बसते हैं जिसमे संतोष और विश्वास .........रहती चहुँ ओर प्रेम की आस , कुंठा दुर्भावना से कोसों दूर ...................नहीं दुराग्रह का कोई स्थान , न ईर्ष्या हो न तपन ह्रदय में ................हो केवल शीतल मलय जीवन में , मन हों सबके ऐसे आह्लाद .................जैसे होता पक्षियों का निनाद , होता पग पग पे स्वाभिमान ..............और अपने राष्ट्र पर अभिमान , मैं ढूंढ़ रहा उस ऊषा को ....................जिसमे छुपा है वो सवेरा , हर रात्रि आता यही विचार ..............किंचित कल का है वह सवेरा | रुपेश ..... .१०/०३ /२००४ सर्वाधिकार सुरक्षित