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बुधवार, 24 अप्रैल 2013

आओ मन की गिरहें खोल दें ......!!!

आओ अपने मन की गिरहें खोल दें ,
 उनके हौसलों को फिर नए पर दें ,
छू पायेंगे वो भी फिर इन  आसमानों को 
गर इक बार अपने ये काँधे हम उनको दें !

आओ मन की गिरहें खोल दें ...

हैं गहरे ख्वाब उनकी  छोटी आँखों में ,
भरे हैं लाखों मुराद इस छोटे मन में ,
उनकी उम्मीदों को फिर नए रंग दें ,
इन सपनों में अपने ही कुछ रंग भर दें !

आओ मन की गिरहें खोल दें ..

तुम्हारे साथ से ही वो दम भर जायेंगे ,
आसमां तो क्या समंदर भी नाप आयेंगे ,
हो जाएगा तुम्हारा  जीवन भी  इन्द्रधनुष सा 
गर इक  बार इस  बचपन को अपना संग  दें 

आओ अपने मन की गिरहें खोल दें .....!!!

 -  रूपेश 


भारत में दो करोड़ अनाथ बच्चों में से केवल 0.3 % हर साल  ही दूसरे परिवारों द्वारा अपनाए जाते हैं ...इसे और बढाने की जरूरत  है .....जिससे ये भी और बच्चों की तरह परिवार का साथ पा सकें !!







1 टिप्पणी:

  1. बहुत सुन्दर रचना | आभार

    कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |
    Tamasha-E-Zindagi
    Tamashaezindagi FB Page

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