सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

हे राम धरा पर आ जाओ ,

हे राम  धरा पर आ जाओ ,
मानव को धृति बता  जाओ !
नैराश्य धर्म का मूल नहीं ,
ये पाठ पुनः सिखला जाओ !!

चले  मानवता प्रगति पथ पर  ,
तुम युक्ति वही दिखा  जाओ !
मानव अहंकार दर्प  में चूर खड़ा ,
 ये दर्प दमन ही कर जाओ !!

मिलते हैं  रावण भी इस कलि में ,
तुम इनकी बलि चढ़ा  जाओ !
अहिल्याओं की अब सुन लो पुकार  ,
तुम इनको मुक्ति  दिला जाओ !!

मारूति जैसा भक्त न मिलेगा यहाँ ,
तुम लखन बिना ही आ जाओ !
मानवता विस्मृत सोयी  पड़ी ,
तुम ह्रदय अलख जगा जाओ !

हे राम  पुनः धरा पर आ जाओ ,
मानव को धृति सिखा जाओ !!

                         रूपेश
                    ०१/०३/२०१२ 

                 सर्वाधिकार सुरक्षित 










टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

मैं इश्क हूं जाया नहीं जाऊंगा !!!

  मैं इश्क हूं जाया नहीं जाऊंगा ! कयामत तलक तुझे याद आऊंगा !! जब भी बीतेंगी गुरबतों में जिन्दगी ! फिर से मोहब्बत का पैगाम फहरा जाऊंगा !! जब बंटेगी जिन्दगानियां फिरकापरस्ती में ! मैं मुल्क की मजहबी दीवारें गिराने आऊंगा !! पुकारेगा लहू जब भी पुरजोर मेहनतकशों का मैं अपना लाल रंग उस लहू में मिला जाऊंगा !! जो चाहेगा बने रहे मुल्क, सबके रहने लायक मैं हर उस शख्स को बावक्त याद आऊंगा !! मैं इश्क हूं , जाया नहीं जाऊंगा  कयामत तलक, तुझे याद आऊंगा !! - रूपेश ( भगतसिंह के लिये...उनके जन्मदिन पर... 28 सितम्बर )

हमारे जीवन में romanticism

आज बहुत दिनों के बाद कुछ लिखने का मन हुआ ..................जीवन सामान्यतः जैसा दीखता है वैसा वस्तुतः होता नहीं .........ये विडम्बना ही तो है कि कैशोर्य में जिस जीवन में जीने की हम कल्पना करते हैं युवा होते- होते उसी कल्पना का उपहास करने लग जाते हैं ..........उसे कोरी भावुकता कह कर नज़रंदाज़ करने की कोशिश करते हैं.............बदती आयु कहीं न कहीं हमें उस romanticism से दूर कर देती है जो कि जीवन को देखने का एक निर्दोष नजरिया देती है ............समय क़ी प्रगति कहीं न कहीं हमें यह एहसास कराने लग जाती है कि जीवन विशुध्तः व्यवहार पर ही चलता है भावुकता पे नहीं ......क्या इसे हमें अपनी हार नहीं मानना चाहिए ! कि जिन भावनाओं को लेकर हमने अपने जीवन का आरम्भ किया था आज उन्ही का हमारे जीवन में नामों निशान तक नहीं है...............अगर यही romanticism भगत सिंह के जीवन से निकल जाता तो क्या वह अपनी जान हमारे लिए देते ? या नरेन्द्र को हम विवेकानंद के रूप में जान पाते ? कहीं न कहीं ये उनका जीवन के प्रति romanticism ही था कि उन्होंने वह किया जो कि उनको संतुष्ट करता था ...........अगर आज हम अपने जीवन...

विचार .....

आज पुनः सोच रहा यह ह्रदय मेरा ..........आखिर कब आएगा वह सवेरा ? है जिसमे राम - राज्य की परिकल्पना .....सर्वत्र सबके लिए सद्भावना , बसते हैं जिसमे संतोष और विश्वास .........रहती चहुँ ओर प्रेम की आस , कुंठा दुर्भावना से कोसों दूर ...................नहीं दुराग्रह का कोई स्थान , न ईर्ष्या हो न तपन ह्रदय में ................हो केवल शीतल मलय जीवन में , मन हों सबके ऐसे आह्लाद .................जैसे होता पक्षियों का निनाद , होता पग पग पे स्वाभिमान ..............और अपने राष्ट्र पर अभिमान , मैं ढूंढ़ रहा उस ऊषा को ....................जिसमे छुपा है वो सवेरा , हर रात्रि आता यही विचार ..............किंचित कल का है वह सवेरा | रुपेश ..... .१०/०३ /२००४ सर्वाधिकार सुरक्षित